मध्यकाल में नारी एक अबला,रमणी और भोग्या बनकर रह गई



किसी भी सभ्य समाज अथवा संस्कृति की अवस्था का सही आकलन उस समाज में स्त्रियों की स्थिति का आकलन कर के ज्ञात किया जा सकता है।

वैदिक काल में स्त्रियों का सम्मान पुरुषों से अधिक था ,स्मृतिकाल में भी स्त्रियों का सम्मान बहुत था किन्तु उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति वैदिक युग की भांति नहीं थी फिर भी आदर सम्मान में कमी नहीं थी ।

सातवीं शताब्दी के बाद मुसलमानों का आक्रमण और उनके स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचार के कारण बहुत प्रतिबन्ध लग गये 

पुत्री के रूप में तथा पत्नी के रूप में स्त्री समाज का अभिन्न भाग रही लेकिन विधवा स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण कालानुसार परिवर्तित होता गया।

पुत्री के रूप में

प्राचीन भारतीय समाज में पुत्रियों को भावी स्त्री के रूप में यज्ञ में पूर्णता और संतति में वृद्धि करने वाली माना जाता था किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता रहा हो, पुत्रियों को भी पुत्रों की भांति शिक्षा दी जाती थी तथा विदुषी पुत्री को समाज में सराहना मिलती थी।परन्तु पराधीन युग में मुस्लिम अत्याचारों से देश और समाज की परिस्थिति के अनुसार पुत्री की स्थिति में अन्तर आता गया।

वैदिक युग में 

वैदिक युग में स्त्री का समाज में पुरुषों के समान सम्मान था उसे देवी, सहधर्मिणी अर्द्धांगिनी, सहचरी माना जाता था  वैदिक युग में स्त्रियों को उच्च शिक्षा पाने का अधिकार था, वे याज्ञिक अनुष्ठानों में पुरुषों की भांति सम्मिलित होती थीं।वे पुरुषों की तरह दाह संस्कार में भाग लेती थीं ,उन्हें शासन में अधिकार था ,वे युद्ध में भी जातीं थीं 

वैदिक युग में अथर्ववेद में पुत्र प्राप्ति की कामना एक धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है  किन्तु वैदिक ग्रंथों में ही कुछ ऐसे अनुष्ठानों का भी उल्लेख है जो पुत्री प्राप्त करने की लालसा से किये जाते थे। 

बृहदारण्यक उपनिषद् में इसी प्रकार के एक अनुष्ठान का उल्लेख है जो विदुषी पुत्री प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता था।

वैदिक युग में पुत्री के जन्म पर शोक मनाने का उल्लेख किसी भी वैदिक ग्रंथ में नहीं मिलता है। 

ऋग्वैदिक काल में लोपामुद्रा, घोषा, निवावरी, सिकता, विश्ववारा आदि अनेक ऐसी स्त्रियां हुईं जिन्होंने ऋचाएं लिख कर ऋग्वेद को समृद्ध किया

वैदिक युग में पुत्रियों के लिये योग्य वर मिलना कठिन नहीं था स्त्रियों को नियोग एवं पुनर्विवाह की भी अनुमति थी अतः माता-पिता के लिये पुत्री का जन्म चिन्ता का विषय नहीं होता था पुत्रियों को इच्छानुसार शिक्षा पाने का अधिकार था वे ज्ञान प्राप्त करती हुई एकाकी जीवन भी व्यतीत कर सकती थीं उन्हें युवा होने पर अपनी इच्छानुसार वर चुनने का भी अधिकार था।

अथर्ववेद के अनुसार पुत्रियां लगभग 16 वर्ष की आयु तक अविवाहित रहती थीं 16 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेने पर पुत्रों की भांति पुत्रियों का भी उपनयन संस्कार कराया जाता था उन्हें ब्रह्मचर्य का भी पालन करना होता था अविवाहित पुत्रियां अपने माता-पिता के संरक्षण में उन्हीं के गृह में रहती थीं। 

वेदों में नारी के स्वरुप की झलक इन मंत्रों में देखें -

यजुर्वेद २०.९

स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है।

यजुर्वेद १७.४५

स्त्रियों की भी सेना हो  स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।

यजुर्वेद १०.२६

शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें |जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों।

अथर्ववेद ११.५.१८

ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है  यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है।

कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें।

अथर्ववेद १४.१.६

माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें

जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे।

अथर्ववेद १४.१.

वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे।

उपनिषद् युग में -

उपनिषद् युग में पुत्रियों को ज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त स्वतंत्रता थी वे वेदों का अध्ययन कर सकती थीं वे वेद तथा तत्व-ज्ञान संबंधी विषयों पर पुरुषों के साथ शास्त्रार्थ अर्थात् वाद-विवाद कर सकती थीं। 

पुरुष के जीवन को स्त्री के बिना अपूर्ण समझा जाता था अतः पुत्री के जन्म को शोक का कारण नहीं समझा जाता था पुत्रियों को विवाह के उपरान्त अधिक अधिकार प्राप्त होते थे विवाह के पूर्व उन्हें अपने माता-पिता के पूर्ण संरक्षण में रहना होता था विदुषी पुत्रियां समाज में विशेष सम्मान पाती थीं।

सैन्धव काल में  

सिन्धु घाटी सभ्यता में पुत्रियों की स्थिति का अनुमान स्त्रियों के आभूषण, देवी भगवती की मूर्ति तथा नर्त्तकी की मूर्ति से लगाया जा सकता है। सैन्धव समाज में जननी की भूमिका निभाने वाली स्त्री का विशेष स्थान था। अतः पुत्रियों के जन्म को भी सहर्ष स्वीकार किया जाता रहा होगा। उन्हें शिक्षा दी जाती थी तथा नृत्य, गायन, वादन आदि विभिन्न कलाओं में निपुणता प्राप्त करने का अवसर दिया जाता था।

उत्तरवैदिक युग में

उत्तरवैदिक युग में पुत्रियों की स्थिति ठीक वैसी नहीं रही जैसी कि वैदिक युग में थी उत्तरवैदिक काल में यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार पुत्रों को दिया गया 

पुत्रियां यज्ञ में सहभागी हो सकती थीं किन्तु यज्ञ नहीं कर सकती थीं पुत्रियों को भी आश्रम व्यवस्था का पालन करना होता था पुत्रों के जन्म पर पुत्रियों के जन्म की अपेक्षा कहीं अधिक खुशी मनाई जाती थी तथा ‘पुत्रवती भव’ का आशीर्वाद पूरा होने की कामना की जाती थी किन्तु पुत्र के स्थान पर पुत्री का जन्म हो जाने पर उसकी उपेक्षा नहीं की जाती थी पुत्री के लालन-पालन पर भी पूरा ध्यान दिया जाता था तथा उसे शिक्षित होने का अधिकार था।

उत्तरवैदिक काल के बाद सभा में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध हो गया और धीरे धीरे उन विचारों का जन्म हुआ जिनमें पुत्री के जन्म को अशुभ घटना माना जाने लगा।


मध्यकाल में विदेशियों के आगमन से स्त्रियों की स्थिति में जबर्दस्त गिरावट आयी अशिक्षा और रूढ़ियां जकड़ती गई,घर की चाहरी दीवारी में कैद होती गई और नारी एक अबला,रमणी और भोग्या बनकर रह गई।

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