सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय


ईश्वर सर्वदा दु:ख में ही साथ देते हैं, अत: ईश्वर वन्दनीय हैं। ईश्वर ने जिस-जिसको सहायता दी है, दु:ख में ही दी है पांडव जब तक दु:ख में थे तब तक श्रीकृष्ण ने उनकी सहायता की, पर पांडव जब सिंहासन पर बैठे तब श्रीकृष्ण भी वहाँ से चले गये, ईश्वर जिसे भी मिले हैं, दु:ख में ही मिले हैं सुख का साथी जीव है और दु:ख का साथी ईश्वर है, इस बात का सदैव चिंतन-मनन करना है।

दु:ख पड़ने पर सांसारिक लोग स्वत: ही हमसे दूरी बना लेते हैं कि कहीं हमारे कारण उनकी कोई आर्थिक क्षति न हो जाये और जब सब छोड़ देते हैं तब सदैव ही भोगों के पीछे दौड़ने वाला यह मन भली प्रकार जान लेता है कि "सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय" तो अब स्मरण हो आता है उस अपने स्वजन का, ह्रदय सच्चे मन से पुकार उठता है- आ जाओ गोपाल अब तो आ जाओ। दु:ख में ही श्रीहरि का स्मरण होता है कहीं देह में चोट लग जाये, असहय वेदना हो जाये मुख से स्वत: ही बारम्बार श्रीहरि नाम का उच्चारण होता है और स्वस्थ होते ही परिवारीजनों का पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है "जाके प्रिय न राम वैदेही, तजिये ताहि कोटि वैरी सम, जदपि परम सनेही"

श्रीहरि की कैसी कृपा कि तजना भी न पड़ा संसार ने स्वत: ही तज दिया कैसी अगाध अनुकंपा हम भी तो बिना दुःख में पड़े उनकी शरण में जाते नहीं एक क्षण में जीवन में परिवर्तन वे ही ला सकते हैं, संसार छोड़ने लगे तो समझ लेना कि श्रीहरि की ही अगाध कृपा बरस रही है और अपने कल्याण का समय आ पहुँचा है, कोई क्रंदन नहीं भर जाना आहलाद से, उल्लास से आ रहे हैं वे गज को छुड़ाने वाले क्या इस संसार-रुपी ग्राह से मुझे न छुड़ावेंगे आ रहे हैं वे नंगे पाँव गरुड़ को छोड़कर।

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